आर्य समाज हिंदू समाज का एक हिस्सा है, जिसकी स्थापना 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था। आर्य समाज के लोग हिंदू धर्म के ही अनुयाई होते हैं, लेकिन यह लोग वेदों के ही एकमात्र धर्म ग्रंथ मानते हैं। जातिवाद, मूर्ति पूजा, कर्मकांड,,तेरहवीं, पिंडदान का विरोध करते हैं, Arya samaj में अंतिम संस्कार का एक अलग ही नियम है। ऐसे में आर्य समाज के लोग antim sanskar कैसे करते हैं, इसकी विधि क्या है?? जानने के लिए पूरे आर्टिकल को जरूर पढ़ें-
Arya samaj kya hai-
आर्य समाज हिंदू धर्म का ही एक अलग संगठन है, जिनके जीवन जीने की एक अलग शैली है। आर्य समाज में आर्य का मतलब श्रेष्ठ होता है, इसी शब्द और विचार के आधार पर महर्षि दयानंद सरस्वती ने इस समाज की स्थापना सन 1875 में किया था। Arya samaj वेदों को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है, और वेदों के सिद्धांतों पर ही जीवन यापन करते हैं। आर्य समाज को मानने वाले लोग वेदों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए, लोगों को सत्य और धर्म की राह पर चलने के लिए प्रेरणा देते हैं।
Arya samaj के लोग मर्यादा पुरुषोत्तम राम और श्री कृष्ण जी को अपना आदर्श मानते हैं, और उनके द्वारा कही गई बातों को ही अपने जीवन का मूल आधार मानते हैं। आर्य समाज में मान्यता है ईश्वर एक है, और उनकी पूजा बिना किसी मूर्ति के सत्य और आस्था के साथ होनी चाहिए, समाज में सबकों शिक्षा और समानता का अधिकार मिलना चाहिए।
हिंदू धर्म और आर्य समाज-
महर्षि दयानंद सरस्वती ने 10 अप्रैल 1875 में इस समाज की स्थापना की थी, जिसका एकमात्र उद्देश्य हिंदू धर्म में सुधार लाना था। समाज में जो भी भ्रांतियां, कुरीतियां और अंधविश्वास हैं उन्हें दूर करने के उद्देश्य थे इसकी स्थापना की गई थी।
Arya samaj के लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, साथ हीं झूठे कर्मकांड,बली, मृत्युंभोज जैसी प्रथाओं का विरोध करते हैं इन्हें सही नहीं मानते। इनका मानना है ईश्वर एक है, जिसकी पूजा सिर्फ सत्य ज्ञान और अच्छे कर्मों के जरिए किया जा सकता है। ये लोग वेदों को सर्वपरी मानकर इसमें बताए गए सिद्धांतों पर चलने के लिए तत्पर रहते हैं।
आर्य समाज में श्राद्ध कर्म को लेकर क्या मान्यता है-
आर्य समाज की मान्यता पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज से अलग है, इस समाज में, माता-पिता और परिवारजन के जीवित रहते ही उनकी सेवा करना ही सच्चा श्रद्धा कर्म है। आर्य समाज का मानना है कि मृत व्यक्ति के मरने के बाद दान दक्षिणा देना या फिर पिंडदान करने से लाभ नहीं होता। बल्कि उसे व्यक्ति के जीवित रहते ही उसकी सेवा करना ही सच्ची श्रद्धा है।
आर्य समाज के विचारधारा के अनुसार जिन माता-पिता ने आपको पाल पोसकर बड़ा किया शिक्षा दिया और संस्कार दिए। उनके प्रति जीवित रहते ही सम्मान और सेवाभाव ही सच्चा श्राद्ध है। यही कारण है की व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत आर्य समाज के लोग पिंडदान, मृत्यु भोज जैसी मान्यताओं को नहीं मानते। बल्कि जीवित रहते ही अपने माता-पिता और गुरुओं को सम्मान करनें में विश्वास रखते हैं।
आर्य समाज में श्राद्ध कर्म कैसे किया जाता है-
Arya samaj kriyakarm –
आर्य समाज के अनुयायियों का मानना है मृत्यु के उपरांत शोक मनाने के जितना जल्दी हो सके सामान्य जीवन में लौट जाए। यही वजह है कि यह लोग हिंदू धर्म के पारंपरिक तेरहवीं के बजाय तीसरे दिन ही शांति पाठ संपन्न करा देते हैं, इस क्रिया में वेदों के मित्रों का उच्चारण होता है, और मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।
आर्य समाज Arya samaj में श्राद्ध कर्म का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि, इस समाज के धर्मगुरु आचार्य किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं मांगते। वे लोग इसे अपना कर्तव्य मानते हैं, लेकिन उन्हें अपने इच्छा अनुसार कोई कुछ देता है ,तो उसे रख लेते हैं।
आर्य समाज में अंतिम संस्कार के नियम और प्रक्रिया-
मृतक को स्नान कराना– Arya samaj के लोग मृत शरीर कों गंगाजल या फिर स्वच्छ जल से स्नान कराते हैं, तत्पश्चात उसे स्वच्छ वस्त्र पहनाते हैं।
पार्थिव शरीर को अर्थी पर रखना– इस प्रक्रिया में मृत शरीर को बांस की अर्थी पर लिटाया जाता है, और उसे सफेद वस्त्र से ढक दिया जाता है।
मंत्र उच्चारण और हवन– तत्पश्चात शमशान घाट या फिर घर पर हवन किया जाता है मंत्रों का उच्चारण होता है।
श्मशान घाट ले जाना– इसके बाद अर्थी को श्मशान घाट ले जाया जाता है, और रास्ते में राम नाम सत्य है या फिर ओम शांति वैदिक मंत्र का उच्चारण होता है।
अंतिम क्रिया दाह संस्कार: मृत शरीर को चिंता पर रखकर अग्नि दी जाती है, और जब तक शरीर जलकर भस्म ना हो जाए, तब तक सभी परिवारजन और रिश्तेदार वहीं पर खड़े रहते हैं।
अस्थियां एकत्रित करना– दाह संस्कार के बाद अस्थियों को एकत्रित करके पवित्र नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।
श्राद्ध कर्म मृत्युभोज की जगह प्रार्थना सभा’:
Arya samaj में मृत्यु भोज, श्राद्ध कर्म करने की जगह मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाता है। प्रार्थना सभा के दौरान हवन, भजन, प्रवचन और सत्संग किया जाता है।
Conclusion
आर्य समाज सनातन धर्म का ही एक हिस्सा है, जो मूर्ति पूजा, व्यक्ति की मृत्यु के बाद पिंडदान, श्राद्ध कर्म, मृत्यु भोज जैसी मान्यताओं को नहीं मानता। केवल वेदों में लिखे गए बातों को मान्यता देता है, अंधविश्वास और कुप्रथा को बढ़ावा नहीं देता है। इनका मानना है ईश्वर एक है, जिसकी पूजा सिर्फ सत्य ज्ञान और अच्छे कर्मों के जरिए किया जा सकता है। इस समाज में माता-पिता और परिवारजन के जीवित रहते ही उनकी सेवा करना ही सच्चा श्रद्धा कर्म है।