सनातन धर्म में अंत्येष्टि संस्कार सिर्फ एक परंपरा नहीं है,, बल्कि एक आध्यात्मिक का अंतिम पड़ाव है,ये संस्कार मानव के जीवन का अंतिम विधि है, जो व्यक्ति के आत्मा के मुक्ति और उसके शरीर को पंचतत्वों में विलय करके इस प्रक्रिया को पूरा किया जाता है।
अंत्येष्टि दो शब्दों से मिलकर बना है,,‘अन्त्य’ यानी अंतिम और ‘इष्टि’ जिसका मतलब यज्ञ होता है। इसे नरयाग भी कहा जाता है, क्योंकि मनुष्यों के लिए किया जाने वाला यह अंतिम यज्ञ है। शास्त्रों में वर्णन है कि मनुष्य का शरीर पांच तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना होता है, इसलिए मृत्यु के बाद इन्हें इन्हीं तत्वों में विलीन करना है प्रकृति का नियम है।
किसी मनुष्य की जब मृत्यु होती है, तो उसके पार्थिव शरीर को सनातन धर्म के अनुसार पूरी श्रद्धा और शास्त्र विधि पूर्वक antim sanskar के लिए तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया का एकमात्र उद्देश्य होता है,, आत्मा को उसके अगले गंतव्य के लिए मुक्त करना और शरीर को पवित्र पूर्वक प्राकृतिक में समाहित कर देना। यही वजह है कि सनातन धर्म में दाह संस्कार को एक आध्यात्मिक अनुष्ठान माना गया है, जिसमें आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर अगली यात्रा के लिए आगे बढ़ती है।
मानव शरीर के dah Sanskar के दौरान कुछ महत्वपूर्ण विधियां है, जिसे हिंदू धर्म के लोग पालन करते हैं, इन महत्वपूर्ण विधियां को बहुत से लोग हैं जो नहीं जानते हैं, इसलिए आज के किस आर्टिकल में अंत्येष्टि संस्कार की पूरी प्रक्रिया का वर्णन करेंगे और बताएंगे इसे सनातन धर्म में क्यों पवित्र अनुष्ठान माना जाता है।
अंत्येष्टि संस्कार प्रक्रिया कब से शुरू करें-
किसी व्यक्ति का जब निधन हो जाता है तो यह माना जाता है, उसके शरीर को आत्मा छोड़कर अगली यात्रा पर निकल चुकी है। ऐसे समय में जब व्यक्ति प्राण त्याग देता है, तो एक प्रहर यानी लगभग 3 घंटे के अंदर उसके शरीर का दाह संस्कार कर देना चाहिए। ताकि उसका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाए।अगर dah Sanskar में थोड़ा भी विलंब होता है, तो पार्थिव शरीर धीरे-धीरे विकृत होने लगती है जिससे वातावरण में अशुद्धियां बढ़ती हैं और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अगर व्यक्ति की मृत्यु रात के समय होती है, तो सनातन धर्म कहता है,शव को सूर्योदय होने तक सुरक्षित रखा जाए। क्योंकि रात के अंतिम संस्कार करना उचित नहीं माना जाता क्योंकि रात्रि में नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव ज्यादा रहता है। इसलिए सूर्योदय होने तक पार्थिव शरीर को सुरक्षित रखना आवश्यक है।
अंत्येष्टि संस्कार में लगने वाली सामग्री-
अंतिम संस्कार को की क्रिया को हिंदू धर्म में दो भागों में बांटा गया है-
- अंतिम संस्कार के लिए घर पर की जाने वाली क्रिया विधि
- श्मशान घाट में की जाने वाली क्रिया विधि
लेकिन इन दोनों क्रियाओं में लगने वाली सामग्री को घर पर एकत्रित कर लेना चाहिए, क्योंकि अंतिम संस्कार में श्मशान घाट पर एक बार पहुंच जाने के बाद पार्थिव शरीर कों बिना जलाये वापस नहीं लौटना चाहिए ऐसी मान्यता है।
अर्थी के लिए लगने वाली सामग्री-
- दो मोटे बांस जो लगभग 8 फुट के हो
- फूस
- कफ़न 6 मीटर
- फूल माला -16
- चंदन
- सुतली लगभग 400 ग्राम
दाह संस्कार के लिए लगने वाली सामग्री antim sanskar samagri –
लकड़ियां – तीन-चार क्विंटल
देसी घी – 4 से 5 किलोग्राम
चंदनचुरा -1 किलो
कपूर – 400 ग्राम
खोपरे गोलें- 5 किलो
गाय का गोबर- लगभग 1 तसला
बांस – 12 फुट के 4
चुल्हे के लिए ईंटे की संख्या – 6
केसर- 40 ग्राम
कस्तूरी- 25 रत्ती
घड़ा – 1
हवन सामग्री- 10 किलोग्राम
तगर – 1 किलोग्राम
यदि व्यक्ति चाहे तो इन सामग्रियों को कम ज्यादा करके ले सकता है। हालांकि इनमें कुछ ऐसी सामग्री है जिन्हें काम ज्यादा नहीं किया जा सकता, जैसे कि बांस और लकड़ियां ।
अंतिम संस्कार के लिए वेदी बनाने की विधि-
antim sanskar के लिए वेदी शुद्ध और पवित्र होना बेहद आवश्यक है क्योंकि शास्त्रों में इसका वर्णन है इसके लिए सबसे पहले जहां वेदी बनानी हो गंगाजल का छिड़काव किया जाना चाहिए। फिर गाय के गोबर से लीपा जाना चाहिए जगह की शुद्धि के लिए यहां प्रक्रिया बहुत जरूरी है। वेदी का आकार साढ़े तीन हाथ चौड़ा, ऊपरसे चार हाथ लंबा, नीचे से एक हाथ लंबा,एक बालिश्त चौड़ी रखीं जातीं हैं ताकि आग पार्थिव शरीर को पूरी तरह भस्म कर सके।
किसी भी परिवार में जब किसी अपने व्यक्ति का निधन होता है तो उस परिवार के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। ऐसे कठिन समय में व्यक्ति को चाहिए कि अंतिम संस्कार के सभी कार्य विध पूर्वक करें। ताकि उस आत्मा का शरीर पांच तत्वों में विधिपूर्वक विलीन हो सके, और उसकी आत्मा नए यात्रा के लिए निकल पाए।
Antyeshti Sanskar के चार प्रमुख चरण-
- सभी सगे संबंधियों को सूचित करें।
- सभी ज़रूरी सामग्री एकत्रित कर लें, जो भी हमने
ऊपर लिस्ट में बताया है।
- फिर शव को स्नान करायें, शरीर में सुगंधित चंदन,
घी और पदार्थों का लेप लगाए। फिर पार्थिव शरीर
को कफन पहनाकर । शव अर्थी पर रखकर
पुष्पमाला और फूलों से सजाए।
- श्मशान भूमि पर वेदी की तैयारी करें, जैसा कि हमने ऊपर बताया है।
अंतिम शवयात्रा और दाह संस्कार की विधि-
जब सभी मित्रगण और सगे संबंधी इकट्ठा हो जाते हैं, तब शव यात्रा निकाली जाती है,, और शव को श्मशान घाट ले जाया जाता है, फिर बनायीं गयी लकड़ियों की शुद्ध वेदी पर शव को रखा जाता है, इसके बाद घर से लायी गयी आग से वेदी के चारों तरफ आज प्रज्वलित की जाती है। घर का कोई सदस्य मरे हुए व्यक्ति को मुखाग्नि देता है, इसके बाद dah Sanskar संपन्न हो जाता है। पार्थिव शरीर को पंचतत्वों में विलीन करने के बाद जितने भी लोग शव यात्रा में शामिल होते हैं स्नान करके वस्त्र बदलते हैं।
दाह संस्कार के बाद की जाने वाली क्रिया-
dah Sanskar के ठीक तीसरे दिन बाद श्मशान घाट जाकर अस्थियों को एक घड़े में इकट्ठा किया जाता है, फिर इन अस्थियों को किसी पवित्र तीर्थ स्थल जैसे प्रयागराज, वाराणसी, हरिद्वार ले जाकर विधि पूर्वक तर्पण किया जाता है, फिर इसके बाद परिवार के सभी लोग मुंडन भी कराते हैं।
अंत्येष्टि संस्कार सनातन धर्म में क्यों महत्वपूर्ण है-
Antyeshti Sanskar सनातन धर्म में मरे व्यक्ति के आत्मा की शांति के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें सम्मान पूर्वक परिवार के सभी सदस्य उसे व्यक्ति को वर्तमान कालचक्र से विदा करते हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म में और शास्त्रों में इसे काफी महत्वपूर्ण माना गया है।
Conclusion-
मोक्ष की प्राप्ति के लिए अंतिम संस्कार बेहद आवश्यक है, इसलिए इस क्रिया को शास्त्रों के अनुसार विधिपूर्वक करना चाहिए। ताकि मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिले, और आगे चलकर परिवार के लोग भी सुख शांति से रह सके। इसलिए इस क्रिया को विधि पूर्वक किसी ज्ञानी पंडित से ही करवायें ।