भारत के बिहार राज्य में स्थित ऐतिहासिक गया शहर को सनातन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे पवित्र स्थान माना गया है। इस शहर को विष्णुनगर के नाम से भी जाना जाता है,क्योंकि यहां पर भगवान विष्णु के चरण चिन्ह विराजमान है। इस शहर की विशेषता के बारे में वायु पुराण और विष्णु पुराण में भी वर्णन मिलता है।
गया शहर तीर्थ स्थल के रूप में पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है, यहां लोग अपने पितरों और पूर्वजों के मोक्ष की प्राप्ति के लिए पिंडदान और श्रद्ध कराने आते हैं। यह शहर फल्गु नदी के किनारे स्थित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों का पिंडदान और श्राद्ध गया में कराया जाता है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते हैं।
गया में हर वर्ष हजारों लोग पितृपक्ष के दौरान श्राद्धकर्म और तर्पण कराने आते हैं। ऐसे में गया में श्राद्धकर्म और पिंडदान कैसे करें, गया में श्राद्ध और पिंडदान कराने का क्या महत्व है? जानने के लिए आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें-
गया में श्राद्धकर्म कराने की पौराणिक मान्यता- (mythological importance of performing shraddhkarm in Gaya)
पुराने ग्रंथों में दिए गए वर्णन के अनुसार पौराणिक काल में गयासुर नाम का एक असुर हुआ करता था, जो भस्मासुर का वंशज था। एक बार उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या किया। ऐसे में जब उसकी घोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न हो गए, और उन्होंने गयासुर को वरदान मांगने का अधिकार दिया। जिसके बाद गयासुर ने अपने शरीर को इतना पवित्र होने का वरदान मांग लिया, जिसे देखते ही व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाए।
ब्रह्मा जी से यह वरदान मिलने के बाद गयासुर इतना पवित्र हो गया कि जिसके दर्शन करते ही लोग पाप मुक्त होकर स्वर्ग लोक जाने लगे। जिसकी वजह से स्वर्ग लोक में पापी लोगों की संख्या ज्यादा हो गई। लोग निडर होकर पाप करने लगे, और गयासुर के दर्शन करके स्वर्ग लोक जाने लगें। अब इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए देवताओं ने एक चाल चली और यज्ञ करने के लिए गयासुर से एक पवित्र स्थान मांगा।
जिसके बाद गयासुर ने खुद को सबसे पवित्र मानते हुए, अपने शरीर को यज्ञ के लिए दे दिया। जब गयासुर यज्ञ की बेदी के लिए लेटा तों उसका शरीर पांच कोस में फैल गया। यहीं पांच कोस आगे चलकर गयासुर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यज्ञ की समाप्ति के बाद गयासुर ने फिर से देवताओं से वरदान मांगा की यह जगह लोगों के मोक्ष प्राप्ति के लिए बना रहे। कहा जाता है कि इस जगह पर श्राद्धकर्म और पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है, और वे जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। यही वजह है सनातन धर्म में गया शहर को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
गया में पिंडदान और श्राद्धकर्म कराने का महत्व- (importance of performing shraddhkarm in Gaya)-:
मोक्ष प्राप्ति के लिए गया सबसे पवित्र जगह है, अगर कोई व्यक्ति अपने पितरों की आत्मा को शांत करना चाहता है तो उसे गया में आकर पिंडदान और श्राद्ध जरूर करना चाहिए।
गया में पिंडदान कराने के लाभ (benefits of doing pinddan in Gaya)
- पूर्वजों की भटकती हुई आत्मा को शांति मिलती है। अगर कुंडली में किसी व्यक्ति के पित्र दोष है, तो इससे पितृदोष से भी छुटकारा मिलता है।
- संतान सुख में अगर किसी प्रकार की बांधा उत्पन्न हो रही हो, तो गया में पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से बाधा हट जाती है और परिवार में सुख शांति बनी रहती है।
- व्यक्ति के जीवन में आर्थिक उन्नति होती है, और मानसिक तनाव कम हो जाता है। अगर संतान प्राप्ति में कोई बाधा आ रही है, तो इस समस्या से भी छुटकारा मिलता है।
पितृ पक्ष के दौरान हर वर्ष फल्गु नदी के किनारे भव्य मेला लगता है, इस दौरान लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान कराते हैं। यहां पर स्थित विष्णुपद मंदिर और अक्षय वट कों पिंडदान के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
कैसे करें गया में पिंडदान (how to perform pinddan in Gaya )
पौराणिक ग्रंथों में दिए गए वर्णन के अनुसार, आत्मा अजर अमर है, इसलिए जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो केवल उसका शरीर मरता है और आत्मा फिर से नये शरीर को धारण कर लेती है। लेकिन कभी-कभी जब किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार, श्राद्धकर्म, पिंडदान सही तरीके से नहीं किया जाता है, तब उसकी आत्मा भटकने लगती है। ऐसे में आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है।
पिंडदान में लगने वाली महत्वपूर्ण सामग्रियां-:
- जौ
- कुशा
- गंगाजल
- सफेद फूल
- चावल
- गाय का घी और दूध दोनों
- मूंग
- स्वांक
- गन्ना
- खीर
पिंडदान कराने की विधि-: (process of performing pinddan)
1.श्राद्ध संकल्प :-
सर्वप्रथम फल्गु नदी में स्नान करके साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें और ब्राह्मण को बुलाकर श्राद्ध संकल्प लें।
2.पिंड बनाने की प्रक्रिया:-
जौं या चावल के आटे में तिल और दूध मिलाकर अच्छी तरह गूंथ लें। फिर इसके बाद इस मिश्रण के छोटे-छोटे पिंड यानी की गोल आकार के गोले बना लें।
3:- तर्पण प्रक्रिया:-
पीतल की थाली में स्वच्छ जल भरें, फिर इसमें दूध, जौं,कुशा और काला तिल डाल दें। फिर इस जल को हाथ में लेकर मृत व्यक्ति का नाम लेते हुए ‘तृप्यन्ताम’ मंत्र का जाप करें, और जल को अर्पित कर दे।
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ब्राह्मण और गौ माता को भोजन कराएं:-
संपूर्ण क्रिया हो जाने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान दक्षिणा दें, पश्चात गाय, कौवा, चींटी कों भी भोजन कराएं। ऐसा करने से शुभ फल मिलता है, और मृतक की आत्मा को शांति मिलती है।
पिंडदान के दौरान ध्यान देने योग्य बातें ( things to remember while performing pinddan )
- पिंडदान प्रकिया हमेशा गया के फल्गु नदी के तट पर होना चाहिए।
- पिंडदान के लिए एकादशी का दिन सबसे शुभ माना जाता है।
- तर्पण के समय मुख दक्षिण दिशा में करके बैठना चाहिए।
- राहुकाल के दौरान भूलकर भी पिंडदान ना करें।
- शिवलिंग पर काला तिल चढ़ाएं, इससे भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं।
- पितरों को जल अर्पण करने के लिए पानी में काला तिल अवश्य मिलाएं।
निष्कर्ष Conclusion-
गया तीर्थ स्थल श्रद्धा, आस्था और मोक्ष प्राप्ति की भूमि है, इस पवित्र स्थल पर श्राद्धकर्म और पिंडदान कराने से पितृ दोष से छुटकारा मिलता है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति चाहता है, कि उसके पितरों की आत्मा को मोक्ष मिले, तो उसे चाहिए कि जीवन में कम से कम एक बार गया जाकर श्राद्धकर्म और पिंडदान जरूर करायें।