जीवन और मृत्यु को प्रकृति का अटूट नियम माना गया है, क्योंकि जिस तरह से सूर्य का उदय होना और अस्त होना निश्चित है। ठीक वैसे ही जन्म के बाद मृत्यु भी निश्चित होता है। यह संसार एक चक्र के भांति निरंतर घूमता रहता है और इसमें विभिन्न प्रकार के जीव जन्म लेते हैं, कर्म करते हैं, और अपने कर्मों का फल भोगने के बाद इस दुनिया से विदा ले लेते हैं। सनातन धर्म में इस जीवन चक्र ( jivan chakra ) को बहुत महत्व दिया गया है, साथ ही मृत्यु के पश्चात आत्मा की मुक्ति के लिए विशेष नियम और विधि विधान भी बनाए गए हैं।
जिस तरह से माता-पिता पूरी निष्ठा और प्रेम से अपने बच्चों की देखभाल करते हैं, और अच्छा जीवन देने की पूरी कोशिश करते हैं। ठीक उसी तरह, बेटे का भी दायित्व बनता है, अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा करें। लेकिन एक पुत्र का कर्तव्य यहीं समाप्त नहीं होता, पुत्र को चाहिए कि जब माता-पिता इस दुनिया से विदा ले। तो पुत्र विधिपूर्वक उनका अंतिम संस्कार (antim sanskar) करें, प्राण त्यागने के बाद मृत्यु तिथि के दिन बरसी और पितृ पक्ष के दौरान श्राद्धकर्म करें। ऐसे में किसी भी व्यक्ति के मरने के बाद बरसी कब करनी चाहिए? बरसी क्यों मनाई जाती है, इसका महत्व क्या है? जानने के लिए आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें-
मृत्यु के बाद चार अवस्थाओं से होकर गुजरती है आत्मा -: ( soul travels through four phases after death)
भूत प्रेत योनि ( bhoot Pret yoni/ ghost phase)
अगर मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार क्रिया कर्म पिंडदान सही तरीके से नहीं किया जाता है, तो उसकी आत्मा प्रेत योनि में चली जाती है।
स्वर्ग लोक की प्राप्ति-: (Swarg lok ki prapti/ departure to heaven)
अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन काल के अनुसार पुण्य करता है, ऐसे में उसका अंतिम संस्कार क्रियाकर्म विधि पूर्वक कर दिया जाता है, तो उसकी आत्मा स्वर्ग लोक में प्रस्थान कर जाती है।
प्रतीक्षा काल-:( Pratiksha kal/ waiting period)
कुछ आत्माएं इस लोक और परलोक के बीच में फंसे रह जाती हैं,और अपने परिजनों द्वारा श्राद्ध कर्म और पिंडदान करने का इंतजार करती हैं। ऐसे में अगर मृत आत्मा के परिवारजन सही तरीके से श्राद्धकर्म और बरसी कर देते हैं, तो प्रतीक्षा काल से आत्मा को मुक्ति मिल जाती है।
4.मोक्ष:- (moksh/ salvation)
इन तीन अवस्थाओं में मोक्ष को सबसे महत्वपूर्ण अवस्था माना गया है, अगर कोई व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, ईश्वर का नाम जाप करता है,तो मृत्यु के बाद उसकी आत्मा जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है।
बरसी मनाने का महत्व-: (barsi manane ka mahatva/ significance of celebrating death anniversary)
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए कई संस्कार किए जाते हैं, जो मृत आत्मा की शांति के लिए काफी आवश्यक है। इन्हीं अंतिम संस्कारों में से बरसी भी एक महत्वपूर्ण संस्कार है, सनातन धर्म में यह मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए तर्पण,हवन, भजन,कीर्तन जैसे अनुष्ठान जरूर करने चाहिए, इनसे आत्मा को शांति मिलती है और मुक्ति के द्वार खुल जाते हैं।
बरसी मनाने से परिवार और समाज के लोगों को उस व्यक्ति के योगदान और अच्छाइयों को याद करने का मौका भी मिलता है। साथ ही नई पीढ़ी को परिवार के मूल्य और संस्कारों के बारे में पता चलता है। इसके अलावा कई लोग बरसी के अवसर पर गरीबों और असहायों को भोजन कराते हैं, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं जिससे सकारात्मक ऊर्जा के साथ-साथ मृतक के घरवालों मानसिक शांति मिलती है।
बरसी कब मनाना चाहिए:- (barsi kab manana chahie/ when to celebrate death anniversary?)
बरसी को पुण्यतिथि और स्मृति दिवस के नाम से भी जाना जाता है। किसी भी मृत व्यक्ति की बरसी मृत्यु तिथि के 1 साल बाद मनाया जाता है। यह एक ऐसा अनुष्ठान होता है, जिस दिन परिवारजन और सगे संबंधी मिलकर दिवगंत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, और उनके द्वारा किए गए नेक कार्य को याद करते हैं।
क्यों मनाई जाती है बरसी -:( kyon manae jaati hai Barsi/ why barsi is celebrated?)
- जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो दाह संस्कार के तीसरे दिन बाद सूतक लगता है और इसी दिन शवदाह की बची हुई हड्डियों को एकत्रित किया जाता है। फिर इन पवित्र अस्थियों को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
- फिर इसके बाद दूसरे दिन शांति कर्म किया जाता है,जिसमें पितृ की आत्मा की शांति के लिए परिवार के सभी सदस्य मुंडन कार्य में शामिल होते हैं। फिर 12वें दिन पिंडदान कार्य संपन्न कराया जाता है।
- 13वें दिन मृत्यु भोज कराया जाता है, जिसमें सबसे पहले ब्राह्मण लोग होते हैं। फिर उसके बाद उन्हें दान दक्षिणा दिया जाता है। फिर इसके बाद मृत्यु भोज में शामिल अन्य व्यक्ति और परिवार के सदस्य भोजन करते हैं।
- अब इसके बाद जिस दिन व्यक्ति की मृत्यु हुई रहती है, 1 साल पूर्ण होने पर ठीक उसी दिन बरसी मनाया जाता है। इस दिन मृतक का विधिपूर्वक श्राद्ध भी कराया जाता है, और जब मृतक के मरे हुए 3 साल पूरे हो जाते हैं तो गया में पिंडदान करके जीवन चक्र से मृतक को मुक्ति दिलाई जाती है।
निष्कर्ष: Conclusion-
सनातन धर्म में अंतिम संस्कार श्राद्धकर्म और पिंडदान केवल एक अनुष्ठान ही नहीं है, बल्कि पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है। जब कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों और माता-पिता का श्राद्धकर्म विधिपूर्वक करता है। तो पितरों से आशीर्वाद की प्राप्ति होती है, धार्मिक ग्रंथो में ऐसा वर्णन है कि अगर किसी परिवार से पितर रूठ जाते हैं, तो उन्हें देवता भी आशीर्वाद नहीं देते हैं। इसलिए अंतिम संस्कार के जितने भी धार्मिक अनुष्ठान है, सभी क्रियाओं को विधि पूर्वक करें।